चार चार्जशीट, 26 बीएनएस धाराएँ, और कुछ समान गवाह बयान। यूपी पुलिस ने किस तरह मज़दूरों के मसले को एक “संगठित वामपंथी साजिश” क़रार दिया – न्यूज़लॉन्ड्री की एक पड़ताल।
नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में हिंसक हुए प्रदर्शनों के दो महीनों से भी ज़्यादा बीत जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने चार एफ़आईआर – 163, 164, 165 और 169 में चार्जशीट दायर की है।
साक्ष्य है: बच्चों की एक लाइब्ररी का उद्घाटन जिसे योजना बैठक बताया गया है, फ़िलिस्तीन के समर्थन में बने पोस्टर जिन्हें आपत्तिजनक बरामदगी बताया गया है, एक व्यक्ति जिसपर “मार्क्सवादी विचारधारा” का आरोप लगाया गया है, और एक व्हाट्सऐप ग्रुप में शामिल लोगों की निजता को का ख़याल रखने का निर्देश जिसे “किसी राष्ट्र-विरोधी कार्रवाई” करने के इरादे का प्रमाण बताया गया है। चार्जशीट के अनुसार हिंसा के कारण क़रीब 3,000 करोड़ का नुकसान हुआ है।
पुलिस का दावा है कि 60 गाड़ियाँ जला दी गयीं, 59 कम्पनियाँ पत्थरबाज़ी और तोड़-फोड़ से क्षतिग्रस्त हो गयीं और औद्योगिक इकाइयाँ कई दिनों तक बन्द रहीं।
दायर की गयी चारों चार्जशीट में जाँचकर्ताओं ने एक समनुरूप साज़िश का आरोप लगाया है : कि यह हिंसा मज़दूरों के प्रदर्शनों के तीव्र होने का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक छोटे से वामपंथी समूह और मज़दूर कार्यकर्ताओं के सुसंगत षड्यंत्र का नतीजा थी।
‘न्यूज़लॉन्ड्री’ ने इन चारों चार्जशीट की यह समझने के लिए पड़ताल की कि जाँचकर्ताओं ने कैसे इस मामले को षड्यंत्र का रूप दिया और इसके लिए किन सबूतों का सहारा लिया।
चार दिनों की ‘अनुचित माँग’
एफ़आईआर संख्या 163 में दायर चार्जशीट के अनुसार कई कारखानो के मज़दूरों ने 10 अप्रैल को प्रदर्शन शुरू कर दिया और उन मसलों को लेकर सड़क जाम कर दिया जिन्हें पुलिस ने “अनुचित माँग” की संज्ञा से नवाज़ा है।
पुलिस के अनुसार “अनुचित माँगों’ में न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी, डबल रेट से ओवरटाइम, साप्ताहिक छुट्टी जैसी माँगें शामिल थीं।
पुलिस के अनुसार आन्दोलनरत मज़दूरों से वार्ता की कोशिश नाक़ाम हो गयी जिसके बाद, “11 अप्रैल को, क़रीब 1,500 से 2,000 की भीड़ में मज़दूरों ने मुख्य दादरी रोड को जाम कर दिया, और नोएडा स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन के सामने भड़काऊ भाषण दिये और आन्दोलनकर्ताओं को हिंसा के लिए उकसाया, जिसके बाद आन्दोलनकर्ताओं ने उपद्रव शुरू कर दिया।“
पुलिस का दावा है कि इसके बाद मज़दूरों ने “क्षेत्र में कई स्थानों पर निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया, पुलिस पर पत्थरबाज़ी की, पुलिसकर्मियों के साथ मार-पीट और गाली गलौज की और उन्हें जान से मार देने की धम्की दी जिसके परिणामस्वरूप कई पुलिसकर्मी घायल हो गये।
इसी चरण पर, फैक्ट्री मालिकों के बयानों के आधार पर जाँचकर्ताओं ने पहली दफ़ा कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठनकर्ताओं की शमूलियत का आरोप लगाया – इनमें शामिल थे आकृति चौधरी (नाटककर्मी), सृष्टि गुप्ता (कलाकार), मनीषा चौहान (मज़दूर), रूपेश रॉय (ऑटोचालक) और आदित्य आनन्द (सॉफ़्टवेयर इंजीनियर) – जिनके इर्द गिर्द यह मामला खड़ा है।
चार्जशीट के अनुसार, “कई कम्पनी मालिकों ने बताया था कि रूपेश रॉय, आदित्य आनन्द और अन्य अभियुक्त शामिल थे, और बताया कि आकृति, सृष्टि, मनीषा, रूपेश रॉय, आदित्य आनन्द और इनके सहभागियों ने एक सोची-समझी साज़िश के तहत आपराधिक गतिविधि को अंजाम दिया और मज़दूरों के आन्दोलन को उग्र बना दिया।“
आकृति, सृष्टि और मनीषा की गिरफ्तारियों के सम्बन्ध में पुलिस ने कई दफ़ा उनके गिरफ़्तारी की जगह सेक्टर 39 बोटानिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन दर्ज की है, जहाँ से 11 अप्रैल की शाम 7 बजे सृष्टि ने यह दावा करते हुए एक लाइव वीडियो डाली थी की यूपी पुलिस उनका “अपहरण” कर रही है।
हिंसा हालाँकि 13 अप्रैल को चरम पर पहुँची फिर भी कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा पूरे घटनाक्रम को संचालित किये जाने का आरोप चारों आरोपपत्रों का आधार बनाया गया है। जाँच जैसे ही एफ़आईआर 163 से 169 की ओर बढ़ती है, पुलिस की कहानी “भड़काऊ भाषण” के आरोपों से आगे बढ़कर कथित योजना-निर्माण बौठकों, वैचारिक लामबन्दी, विदेशी फ़ण्डिंग और एक संगठित आपराधिक साज़िश तक फैल जाती है।
चारों आरोपपत्रों में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की 26 धाराओं के प्रावधान लगाये हैं, जिसमें सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान से संरक्षण अधिनियम तथा आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम के प्रावधान भी शामिल हैं। आरोपों में दंगा (बीएनएस धारा 191(2)), आपराधिक षड्यंत्र (धारा 61(2)), हत्या का प्रयास (धारा 109), लोक सेवक पर हमला (धारा 121(1)), सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना (धारा 324(4)) सहित कई गम्भीर अपराध शामिल हैं; चारों एफ़आईआर में इन्हीं धाराओं का संयोजन अलग-अलग तरीके से किया गया है।
कुल मिलाकर इन अलग-अलग धाराओं के संयोजन को एक साथ देखने पर अभियोजन पक्ष का मामला केवल प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि उसे एक संगठित आपराधिक षड्यंत्र के रूप में पेश करता है।
कथित ‘षड्यंत्र’ की रूपरेखा
आरोपपत्रों के अनुसार, इस हिंसा की तैयारी मज़दूरों के सड़कों का रुख़ करने से लगभग तीन सप्ताह पहले ही शुरू हो गयी थी।
एफ़आईआर 169 के आरोपपत्र में इस कथित षड्यंत्र की शुरुआत 22 मार्च बतायी गयी है जब करावल नगर के एक निवासी के घर भगत सिंह युवा केन्द्र के बैनर तले बच्चों के पुस्तकालय के उद्घाटन समारोह आयोजन को एक योजना-निर्माण बैठक के रूप में पेश किया गया है।
आरोपपत्र में कहा गया है कि इस कार्यक्रम में आदित्य, रूपेश, सत्यम वर्मा (लखनऊ के पत्रकार और अनुवादक), आकृति, सृष्टि, मनीषा तथा रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इण्डिया से जुड़े और “माओवादी/कम्युनिस्ट विचारधारा” से प्रभावित अन्य सहयोगी मौजूद थे।
पुस्तकालय उद्घाटन का यह कार्यक्रम सार्वजनिक था। भगत सिंह युवा केन्द्र के फ़ेसबुक पेज पर अपलोड की गयी तस्वीरों में करावल नगर स्थित पुस्तकालय का उद्घाटन कार्यक्रम देखा जा सकता है। इनमें कई आरोपितों के अलावा दर्जनों बच्चे भी कार्यक्रम में शामिल नज़र आते हैं।
आरोपपत्र में नामज़द एक कार्यकर्ता ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा,”अप्रैल में दर्जनों पुलिसकर्मी तलाशी वारण्ट लेकर आये थे। वे बोरियों में हमारे पर्चे भर कर ले गये। उसके बाद वे दोबारा नहीं आये। दो दिन पहले हमने वहाँ बच्चों के लिए समर कैम्प आयोजित किया।”
आरोपपत्र में आगे कहा गया है कि 1 अप्रैल को नोएडा के अरुण विहार स्थित आदित्य के किराये के मकान पर एक और बैठक हुई, जहाँ आन्दोलन की “रूपरेखा” तैयार की गयी थी। जाँचकर्ताओं का कहना है कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से पता चलता है कि कई आरोपी इन बैठकों में शामिल थे। पुलिस ने करावल नगर को आन्दोलन का “मुख्य योजना एवं समन्वय केन्द्र” बताया है।
आरोपपत्र के अनुसार, इन बैठकों के बाद संगठनकर्ताओं ने व्हाट्सऐप ग्रुप्स, सोशल मीडिया मंचों और मुद्रित पर्चों के व्यापक नेटवर्क के माध्यम से मजदूरों को संगठित किया।
इस कथित डिजिटल अभियान का केन्द्र “रिचा ग्लोबल” नाम का एक व्हाट्सऐप ग्रुप बताया गया है। आरोपपत्र में शामिल गवाहों के बयानों के मुताबिक, आदित्य और रूपेश ने मजदूरों को इस ग्रुप में जोड़ा था। अशान्ति फैलने से कुछ दिनों पहले इसमें हड़ताल का आह्वान और प्रबन्धन की आलोचना करते वीडियो तथा मजदूरों से एकजुट होने की अपील वाले सन्देश साझा किये गये थे।
एक मज़दूर ने जाँचकर्ताओं को बताया कि उसे 10 अप्रैल को इस ग्रुप का लिंक मिला था। दूसरे मज़दूर ने दावा किया कि ये संगठनकर्ता अक्सर ही फैक्टरी के गेटों पर आकर मज़दूरों से आन्दोलन में शामिल होने का आह्वान किया करते थे।
मंगल नामक एक गवाह, जिसका बयान अन्य एफ़आईआर में भी दर्ज है, ने पुलिस को बताया,”मैंने कुछ मज़दूरों से सुना कि सत्यम वर्मा और हिमांशु ठाकुर नाम के लोग भी मज़दूरों के बीच आये थे और साज़िश के तहत उन्हें भड़काने का काम कर रहे थे।”
बरामदगी: बैनर, अख़बार और पोस्टर
हिमांशु ठाकुर (हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हुए सामाजिक कार्यकर्ता) के यहाँ तलाशी के दौरान पुलिस ने एक लैपटॉप, दो टैबलेट, एक हेडफोन, दो स्पाइरल नोटबुक्स, तीन निजी डायरी, एक श्रमिक यूनियन का कार्ड, आरडब्ल्यूपीआई का सदस्यता कार्ड, एक छात्र संगठन का सदस्यता कार्ड, हड़ताल से जुड़े पर्चे, सात छोटे-बड़े बैनर, ‘मज़दूर बिगुल’ अख़बार के 184 पुराने अंक, ‘कोपल’ पत्रिका तथा पाँच पुस्तकें बरामद करने का दावा किया है।
सत्यम के कार्यालय से पुलिस ने “एक हार्ड डिस्क, चार सीपीयू, तीन पेन ड्राइव, सात चेकबुक, तीन लैपटॉप, एक रजिस्टर, चार सहयोग रसीदें और तीन पेन ड्राइव” बरामद करने का दावा किया। इसी तरह आदित्य के घर से तीन पेन ड्राइव, एक राउटर, एक साधारण मोबाइल फ़ोन, माओवाद और साम्यवाद पर आधारित पुस्तकें, पर्चे, हस्तलिखित डायरी के पन्ने, ‘मज़दूर बिगुल’ के अंक, फ़िलिस्तीन से सम्बन्धित पोस्टर तथा श्रम क़ानूनों से जुड़े पर्चे बरामद किये गये हैं।
चारों आरोपपत्रों में पुलिस ने आरोपियों और उनसे जुड़े संगठनों की वैचारिक पृष्ठभूमि पर भी ख़ासा ज़ोर दिया है।
आरोपपत्रों में आरोपियों के पिछले कई वर्षों में मज़दूर आन्दोलनों, सीएए-विरोधी प्रदर्शनों, छात्र आन्दोलनों और अन्य अभियानों में शमूलियत के आधार पर उनका सम्बन्ध रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ़ इण्डिया, बिगुल मज़दूर दस्ता, नौजवान भारत सभा, दिशा स्टूडेण्ट्स ऑर्गनाइजेशन, स्त्री मुक्ति लीग और जनचेतना जैसे संगठनों से बताया गया है।
उदाहरण के तौर पर, एफ़आईआर 163 के आरोपपत्र में यह वाक्य दर्ज है: “अभियुक्त सत्यम वर्मा मार्क्सवादी विचारधारा का आरोपी है और आरडबल्यूपीआई (रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ़ इण्डिया) को स्थापित करना चाहता है। मज़दूर बिगुल अख़बार के अंक भी उसके कार्यालय से बरामद किये गये हैं।“
कुछ हफ़्तों पहले ही आदित्य और रूपेश के साथ हिरासत मे हुई यातना पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारत में ‘वामपंथी’ विचारधारा से ताल्लुक रखना या उसका अनुसरण करना अपराध नहीं है।
वहीं, पुलिस ने दावा किया कि पुलिस हिरासत में आदित्य से हुई पूछताछ के दौरान उसकी कहने पर 35 डण्डे, 30 लोहे की रॉड, 6 लीटर पेट्रोल, 5 लीटर थिनर, 10 दुपट्टे और 12 काँच की बोतलें बरामद की गयीं हैं।
एफ़आईआर 163 के आरोपपत्र में बार-बार मार्क्सवादी विचारधारा, वामपंथी संगठनों की सदस्यता तथा राजनीतिक साहित्य की बरामदगी को कथित साज़िश का हिस्सा बताया गया है। हालांकि, कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इनका हिंसा की योजना बनाने या उसे अंजाम देने से क्या सम्बन्ध है।
इतना ही नहीं, पुलिस लगातार ही सोशल मीडिया पर हड़ताल के आह्वान और विचारधारात्मक पोस्ट्स को “दुरुपयोग” और “प्रोपेगेंडा” क़रार रही है।
चार्जशीट में दावा है कि 20 से अधिक सोशल मीडिया ग्रुप्स में साझा किये गये 300 से अधिक “हिंसक” सन्देशों का इस्तेमाल कथित साज़िश को अंजाम देने के लिए किया गया। वहीं, एफ़आईआर 164 की चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि विरोध-प्रदर्शन से पहले मज़दूरों को लामबन्द करने के उद्देश्य से पर्चे तैयार और वितरित किये गये थे।
इसी तरह, एक अन्य आरोपी योगेश मीणा (दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय के छात्र) पर आरोप है कि उन्होंने 13 अप्रैल को मदरसन कम्पनी परिसर के बाहर जुटे मज़दूरों को प्रोत्साहित करने के लिए ऑडियो, वीडियो और व्हाट्सऐप चैट प्रसारित किये।
जाँच के दौरान यह भी दावा किया गया है कि आन्दोलन को आर्थिक सहायता प्राप्त थी। एफ़आईआर 164 की चार्जशीट के मुताबिक़, रुपेश रॉय ने प्रदर्शन से पहले कथित तौर पर मज़दूरों के बीच 40,000 रुपये बाँटे थे, वहीं गिरफ्तार किये गये चार मज़दूरों ने जाँचकर्ताओं को बाद में बताया कि उन्हें दंगे में शामिल होने के लिए रुपेश से 10-10 हजार रुपये मिले थे।
चार्जशीट में कई आरोपियों के वित्त की भी पड़ताल की गयी है। जाँचकर्ताओं का दावा है कि सत्यम वर्मा के बैंक खाते में विदेशों से 56,845 अमेरिकी डॉलर (लगभग 54.10 लाख रुपये) की कई दर्जन ट्रांज़ैक्शन हुईं हैं; वहीं एक अन्य हिस्से में उनके खाते में लगभग 1.12 करोड़ रुपये जमा होने का भी उल्लेख है। हालांकि, इन लेन-देन की तिथियाँ केवल केस डायरी में दर्ज हैं, जिनसे पता चलता है कि ये लगभग दो दशकों—2005 से 2023—के बीच हुई थीं।
चार्जशीट में कहा गया है, “आरोप है कि यह अभियुक्त विदेशों से अमेरिकी डॉलर, पाउंड, यूरो आदि में धन प्राप्त करता है और उसे मज़दूरों में बाँटकर हिंसक आन्दोलन के लिए उकसाता है। इस मामले में जाँच अधिकारी ने उसकी रिमाण्ड प्राप्त की। अब तक एकत्रित साक्ष्यों और जाँच के आधार पर अभियुक्तों द्वारा जानबूझकर आगज़नी किया जाना प्रथम दृष्टया सिद्ध पाया गया। इसलिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 326(एफ़) जोड़ी गयी है।”
केस डायरी इससे भी एक क़दम आगे जाती है। एफ़आईआर 163 की चार्जशीट के साथ संलग्न केस डायरी-16 में पुलिस ने रुपेश रॉय के कथित खुलासा बयान का ज़िक्र किया है, जिसमें नेपाल के रास्ते हवाला के ज़रिये धन भेजने वाले एक भूमिगत नेटवर्क का आरोप लगाया गया है, जिसे कथित रूप से सत्यम वर्मा संचालित करते थे।
बयान में यह भी दावा किया गया है कि इस नेटवर्क की वित्तीय व्यवस्था इतनी गोपनीय थी कि “आप और आपकी साइबर टीम महीनों तक जाँच करें, तब भी धन के स्रोतों का पता नहीं लगा पाएंगे।” हालांकि, क़ानूनी तौर पर ऐसे खुलासा बयान सामान्यतः साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होते, सिवाय उस सीमित हिस्से के, जिससे किसी नये तथ्य की बरामदगी होती हो।
“साज़िशकर्ताओं” का परिचय
सत्यम वर्मा 61 वर्ष के हैं, वे एक पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं, जो लखनऊ में रहते हैं। उन्होंने लगभग दो दशक तक यूएनआई वार्ता के साथ काम किया है। वे ‘भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ के सम्पादक हैं तथा बालज़ाक, अप्टन सिंक्लेयर और रोमिला थापर की पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद कर चुके हैं, वे लम्बे समय से जनचेतना पुस्तक और जागरूक नागरिक मंच से भी जुड़े रहे हैं।
आदित्य आनन्द (28) बिहार के हाजीपुर के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और एनआईटी जमशेदपुर से स्नातक हैं। कॉर्पोरेट नौकरी के साथ-साथ उन्होंने नोएडा में निम्न आय वर्ग के परिवारों को बिजली कनेक्शन दिलाने जैसे सामुदायिक अभियानों में वॉलंटियर के रूप में भी काम किया है।
44 वर्षीय ऑटो चालक रुपेश रॉय ग्रेटर नोएडा के कुलेसरा के निवासी हैं, वे मज़दूरों को संगठित करने और स्थानीय जन अभियानों में सक्रिय रहे हैं, जिनमें अनौपचारिक बस्तियों में नियमित बिजली आपूर्ति की माँग भी शामिल रही है।
आकृति चौधरी, 25 वर्ष, पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर से रंगकर्मी हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में परा-स्नातक हैं। वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग से जुड़ी हैं और नुक्कड़ नाटक, कार्यशालाओं तथा महिला मज़दूरों से जुड़े अभियानों में सक्रिय रही हैं।
सृष्टि गुप्ता, 26 वर्ष, उत्तर प्रदेश के अमेठी की कलाकार हैं, वे विश्वभारती विश्वविद्यालय, शान्तिनिकेतन से एमएफ़ए में परास्नातक हैं और विभिन्न दृश्य कला माध्यमों में काम करती हैं। चौधरी कि ही तरह वे भी प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स लीग से जुड़ी हैं और सामाजिक आन्दोलनों का कलात्मक दस्तावेज़ीकरण करने के साथ-साथ निम्न आय वर्ग की बस्तियों में कार्यशालाएं आयोजित करती रही हैं।
मनीषा चौहान, 22 वर्ष, मूलतः बिहार की रहने वाली फैक्ट्री मज़दूर हैं और गिरफ्तारी के समय नोएडा में कार्यरत थीं। पुलिस का मामला काफ़ी हद तक उनसे जुड़ी व्हाट्सऐप चैट पर आधारित है, इस आरोप के साथ कि उन्होंने प्रदर्शन से पहले मज़दूरों को संगठित करने में भूमिका निभायी।
हिमांशु ठाकुर, 24 वर्ष, उत्तराखण्ड के काशीपुर के निवासी हैं, और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में परा-स्नातक हैं और पीएचडी प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। वे दिशा स्टूडेण्ट्स ऑर्गेनाइज़ेशन से जुड़े हैं और 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में अध्यक्ष पद पर चुनाव भी लड़ चुके हैं और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक अभियानों में सक्रिय रहे हैं।
सबसे कम उम्र के आरोपी- 23 वर्षीय योगेश मीणा दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेण्टर के विधि छात्र हैं और श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के पूर्व छात्र हैं। वे भी दिशा स्टूडेण्ट्स ऑर्गेनाइज़ेशन से जुड़े हैं और 2025 के दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में उम्मीदवार रह चुके हैं और पेपर लीक और फ़ीस वृद्धि के खिलाफ़ छात्र अभियानों में भी शामिल रह चुके हैं। इस मामले में मीणा की गिरफ़्तारी सबसे बाद में, 30 मई को, हुई थी।
केस डायरी वास्तव में क्या कहती है?
हालांकि चार्जशीट में बार-बार यह दावा किया गया है कि 20 से अधिक सोशल मीडिया ग्रुप्स में 300 से ज्यादा “हिंसक” संदेश साझा किये गये, लेकिन न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा केस डायरियों की समीक्षा में केवल कुछ चुनिन्दा चैट ही देखने को मिलीं।
एक संवाद, जिसे कथित तौर पर आकृति के फ़ोन से बरामद बताया गया है, में मनीषा और एक अन्य कार्यकर्ता मज़दूरों के फ़ोन नम्बर व्हाट्सऐप ग्रुप्स में जोड़ने तथा मदरसन, ऋचा ग्लोबल और अन्य प्रदर्शन स्थलों से वीडियो एकत्र करने पर चर्चा कर रहे हैं।
एक अन्य सन्देश, जिसे उसी कार्यकर्ता द्वारा “दिशा” के व्हाट्सऐप ग्रुप में साझा किया गया बताया गया है, में दावा किया गया है कि पुलिस “बहुत बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां” करने की तैयारी कर रही है और “शान्तिपूर्वक बैठे लोगों को डरा रही है।” सन्देश में कहा गया है कि “गैरक़ानूनी कार्रवाई पुलिस कर रही है” और लोगों से बड़ी संख्या में पहुंचने, पुलिस की कार्रवाई का विरोध करने तथा पुलिस की मौजूदगी का वीडियो रिकॉर्ड करने की अपील की गयी है।
एफ़आईआर 163 की चार्जशीट के साथ संलग्न केस डायरी-27 में कथित साज़िश को पुष्ट करने के लिए डिजिटल साक्ष्यों पर विशेष ज़ोर दिया गया है। जाँचकर्ताओं ने कई आरोपियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का विश्लेषण कर यह दिखाने की कोशिश की है कि वे प्रदर्शन के दौरान नोएडा में मौजूद थे।
लेकिन सत्यम वर्मा के मामले में पुलिस एक क़दम और आगे जाती है। उनके सीडीआर के आधार पर जाँचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि 5 अप्रैल को दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने रुपेश, आकृति, सृष्टि, आदित्य, हिमांशु और मनीषा को आन्दोलन की “पूरी योजना समझाई”।
लेकिन केस डायरी में ऐसी कोई कॉल रिकॉर्डिंग या सन्देश पेश नहीं किया गया है जिसमें इस तरह के निर्देश दर्ज हों; यह निष्कर्ष केवल कॉल पैटर्न और लोकेशन के आधार पर निकाला गया है।
केस डायरी में “बिगुल मीडिया” नामक व्हाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुप्स की कुछ बातचीत भी शामिल की गयी है। पुलिस के अनुसार, इन ग्रुप्स में मज़दूरों को संगठित करने, नये सदस्यों को जोड़ने के लिए इनवाइट लिंक बनाने, हड़ताल से जुड़े वीडियो साझा करने, रुपेश, आकृति, मनीषा और सृष्टि की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली से लोगों को फेज़-2 थाने के बाहर जुटने का आह्वान तथा नोएडा पुलिस को फ़ोन कर उनकी रिहाई की माँग करने जैसी बातें हुईं थीं।
इन्हीं चैट्स में से एक संवाद को पुलिस ने गोपनीयता के प्रमाण के रूप में भी पेश किया है। एक सन्देश में गुरुग्राम और मानेसर के मज़दूरों से सम्पर्क करने की बात कही गयी थी, जिस पर एक सदस्य ने जवाब दिया कि ग्रुप में किसी का नाम न लिया जाए, केवल फोन नम्बर साझा किए जाएं। केस डायरी ने इसे पहचान छिपाने की कोशिश बताते हुए साज़िश का हिस्सा माना है। डायरी में लिखा गया है, “इससे प्रतीत होता है कि ये लोग अपनी पहचान छिपाना चाहते थे ताकि किसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि को अंजाम दे सकें।”
लेकिन, इस चार्जशीट में पेश किये गये संवादों में अपने-आप प्रदर्शन के तालमेल, संवाद नेटवर्क के विस्तार और वीडियो साझा करने समेत गिरफ़्तार हुए लोगों के समर्थन की बातचीत ही नज़र आती है।
यही नहीं, एफ़आईआर 163 की केस डायरी 28 में दर्ज कई गवाहों के बयान लगभग शब्दशः एक से प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए, ऋचा ग्लोबल के एचआर मैनेजर अभिषेक सिंह और सुरक्षा पर्यवेक्षक अनिल कुमार के बयान काफी हद तक एक-दूसरे से मेल खाते हैं। दोनों का कहना है कि 9 अप्रैल तक कम्पनी में “कोई समस्या नहीं थी”। इसके बाद दो कर्मचारी—भूपेन्द्र उर्फ “भूपी” और सतीश उर्फ “सिद्धार्थ”—रुपेश द्वारा कथित रूप से ऋचा ग्लोबल के नाम पर बनाये गये एक आन्दोलनकारी ग्रुप से जुड़ गये।
दोनों यह भी कहते हैं कि “वफ़ादार कर्मचारियों” ने उन्हें बताया था कि भूपेन्द्र ने अधिक से अधिक मज़दूरों को आन्दोलन में शामिल करने के लिए पैसे लिए थे।
ग़ौर करने वाली बात यह है कि इन दोनों ही गवाहों ने पैसे बंटते हुए देखने का दावा नहीं किया है। बल्कि अन्य मज़दूरों से मिली जानकारी का हवाला दिया है।
चार अलग-अलग एफ़आईआर की चार्जशीटों में पुलिस ने बैठकों, वैचारिक संगठनों, वित्तीय लेन-देन और डिजिटल संचार को जोड़ते हुए एक विस्तृत साज़िश का ताना-बाना पेश किया है। लेकिन केस डायरियों में उद्धृत अधिकांश दस्तावेज़ी अंश मज़दूरों को संगठित करने, विरोध-प्रदर्शनों के संचालन, समर्थन की अपील करने और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) के आधार पर पुलिस द्वारा बनाये गये निष्कर्षों से जुड़े हैं वहीं इसके विपरीत, हिंसा को अंजाम देने के सीधे निर्देश देने वाले दस्तावेज़ अपेक्षाकृत बहुत कम नज़र आते हैं।
चार्जशीट में लगाये गये आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए, आरोपियों में से कुछ की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता कवलप्रीत कौर ने न्यूज़लॉन्ड्री से यह कहा:
“नोएडा पुलिस द्वारा पेश किया गया मामला दो स्वतंत्र आधारों पर क़ानूनी रूप से टिक नहीं पा रहा। पहला, अभियोजन गम्भीर प्रक्रियागत अनियमितताओं से ग्रस्त है। गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेज़ों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं जिनमें गिरफ्तारी के स्थान को लेकर विसंगतियाँ शामिल हैं, जहाँ रिकॉर्ड में दर्शाया गया स्थान असल स्थान से अलग है। इसके अलावा, तारीख़ों और घटनाओं के क्रम में भी परस्पर विरोधी विवरण दर्ज हैं।
“दूसरा, चार्जशीट ने संविधान द्वारा संरक्षित लोकतांत्रिक जनसंगठन और आन्दोलन को अनुचित तरीके से एक कथित राष्ट्र-विरोधी आपराधिक साज़िश के साथ जोड़ दिया है। न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोत्तरी की माँग करना, मज़दूरों को संगठित करना और सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेना जैसी लोकतांत्रिक गतिविधियों को हिंसा की एक व्यापक साज़िश का हिस्सा क़रार दिया गया है। जबकि वे यह बता पाने में नाक़ाम हैं कि आरोपियों में से किसने हिंसा का कौन-सा ठोस कृत्य किया है।
इसके बजाय, वह साज़िश के एक अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत वैध राजनीतिक संगठन और जनसंगठन की गतिविधियों को भी अपराध के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है, बिना तथाकथित अपराध के आवश्यक कानूनी साक्ष्य वास्तव में पेश किये।”
अब इन आठों आरोपियों के नाम 11 एफ़आईआर में शामिल किये जा चुके हैं। इनमें से दो—सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी—को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत भी निरुद्ध किया गया है। इस बीच, जिन प्रमुख माँगों को लेकर यह आन्दोलन शुरू हुआ था, उनमें से एक अन्ततः स्वीकार कर ली गयी है। विरोध-प्रदर्शनों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यूनतम मज़दूरी में लगभग 2,500 रुपये की बढ़ोतरी कर दी।
(न्यूज़लॉंड्री से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।)